अधिकांश लोग मानते हैं कि उचित आचार-विचारोंका पालन, कत्र्तव्यकर्म एवं धर्माचरण ही ‘आचारधर्म' है । ‘आचारधर्म’ का इतना संकीर्ण अर्थ न समझें । आचारधर्मकी व्यापक अर्थपूर्ण परिभाषा है - ‘ईश्वरके चरणोंतक ले जानेमें सहायक जीवनका प्रत्येक कृत्य, अर्थात् आचरण तथा उसकी शिक्षा प्रदान करनेवाला धर्म । ‘आचार: प्रभवो धर्म: ।’ अर्थात् ‘धर्म आचारसे उत्पन्न हुआ है ।’ हमारे धार्मिक जीवनकी रचना आचारधर्मपर निर्भर है । धर्माचरण एवं साधनाका उद्देश्य है ‘ईश्वरप्राप्ति’ । आचारधर्मके पालनसे व्यक्तिकी सात्त्विकता बढकर वह साधनामें रुचि लेने लगता है । उन्नत साधक तथा संतोंकीr साधना अंतर्मनमें निरंतर चलती रहती है, अत: उन्हें मानसिक एवं बौद्धिक स्तरके आचारधर्मकी आवश्यकता नहीं रहती है । किसी भी विषयके विविध दृष्टिकोण एवं उनका महत्त्व समझनेपर वह मानस पटलपर भली-भांति अंकित होता है और उसे आचरणमें लानेकी प्रेरणा भी प्राप्त होती है । इसीलिए प्रस्तुत विशेषांकमें आचारधर्मके विविध कृत्योंका महत्त्व बताया है । आचारधर्म-पालनसे हिंदु धर्मका महत्त्व जानें, उनमें जिज्ञासा जागे एवं साधनाकी प्रेरणा मिले यही श्रीगुरुचरणोंमें प्रार्थना है ! - संपादक